बात बीते साल की गर्मी की है,रोज़ की तरह आज भी मैं सुबह से उठ कर किचन के काम में लग गई।
नाश्ते के लिए पोहा, इडली सांभर,आलू की सूखी सब्ज़ी और पराठे बनाए,लंच में अरहर दाल,चावल, रोटी और करेले।
उस दिन तबियत थोड़ी गड़बड़ थी क्योंकि एक दिन पहले भी बहुत हेक्टिक रहा एक मिनट नही मिला था बैठने को सुकून से,और अगले दिन भी सुबह ५ बजे जग कर सब काम काज में लग गई।
खाने पीने से फ्री होकर,हरमन को नहलाया फिर उसकी ऑनलाइन क्लास थी,१:३० बजे क्लास से फ्री हुए फिर हरमन को खाना खिलाकर उसे रंग दिए करने के लिए और मैं लेट गई क्योंकि बिलकुल हिम्मत न थी कुछ करने की।
आंखों में और सर में बेहद दर्द था,इस कारण सोचा कुछ देर आराम कर लूं।
आधा घंटा ही हुआ था के मेरे पति ऑफिस से आगाये,मुझे सोता देख बहुत गुस्सा हुए की तुम्हे कितनी बार कहा है मेरे लौटने के टाइम पर सोया नही करो।
सो कैसे रही थी तुम??
बहुत आलसी हो,करती ही क्या हो दिनभर मुझे तो ये समझ नही आता काम क्या करती हो दिनभर आलस फैलाने के अलावा।
ये शब्द मेरे दिल को चुभ गए,दिन भर काम करने के बाद भी ये सब सुनने को मिल रहा है।
मेरा ना कोई दर्द है,ना तकलीफ, मैं तो शायद इंसान ही नहीं हूं सुपर ह्यूमन हूं,जिसे कोई दिक्कत ही नहीं होती है।
उस दिन मुझे रिलाइज हुआ चाहे कितनी ही दफा मैं इनकी भूल चूक माफ करूं,या कितना सपोर्ट करूं,या कितना पिस्ती रहूं काम में ,आखिर में हूं तो मैं भी एक महिला और इस देश में एक महिला की औकात कुछ नहीं है।
भले ही हम कितनी बड़ी बड़ी बातें करें, चन्द्रमा पर चले जाएं या ओलंपिक में लड़कियां मेडल जीत लाएं,कुश्ती में अपना परचम लहरा दें फिर भी आदमी एक औरत का सम्मान नहीं कर पाता।
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ज़रा कुछ देर बैठ कर खुद से ये सवाल ज़रूर करिएगा,मैं कितनी बार अपमानित हुई,कितनी बार सबको माफ किया,कितनी बार मेरे साथ नाइंसाफी हुई,कितनी बार बेटी या बहू समझने की बजाए एक काम वाली से भी बत्तर वैल्यू की गई मेरी।
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सोच विचार कीजिए और हमारे साथ शेयर कीजिए।
अमिता शर्मा
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