तुम स्पेशल क्या करती हो ये बतादो ज़रा मुझे।
घर का काम तो और औरतें भी करती हैं ना,उसमे कौन सी बहुत बड़ी बात है,ड्यूटी है तुम्हारी करना ही पड़ेगा वो तो।
वहां खड़ी अस्मिता अपने पति की बात चुपचाप सुनती रही और वहां से चली गई।
वो जानती थी अगर उसने कुछ कहा तो ये सुनने को मिलेगा के तुम जवाब तालाब करती हो और बेहेस बढ़ेगी इसलिए बेहतर है चुप रहो।
पुराने पल याद करते हुए अस्मिता अपनी ही ख्यालों में को गई :
मैं जॉब करना चाहती हूं शादी के बाद भी।
नहीं,में तुम्हे जॉब नहीं करनी दूंगा चाहे कुछ हो जाए।
पर आजकल तो सब जॉब करते हैं और आर्थिक तौर पर हमलोगों को ही मदद मिलेगी,दोनों कमाएंगे तो।
मुझे कुछ नहीं सुनना अस्मिता,नहीं मतलब नहीं में और लोगों की तरह तुम्हे जॉब नहीं करनी दूंगा बस अब दुबारा इस बारे में बात मत करना।
उसके ख्वाबों की रील तोड़ते हुए शुभम ने कहा दीदी उस दिन जो तुम पर चीखी चिल्लाई और इतना बुरा सुलूक किया वो बस इस वजह से क्यूंकि तुम कुछ काम नहीं करती हो
मतलब जॉब नहीं करती हो,घर के काम तो कोई भी कर ले।
अस्मिता दुखी मन से सोचने लगी लव मैरिज के बाद भी इतना कुछ सहना पड़ता है,सुनना पड़ता है पहले पता होता के कैसा परिवार है तो कभी शादी ना करती।
क्या इन्हे इतना भी नहीं पता के घर का कितना काम हो जाता है और फिर बच्चे का काम अलग।
आज तक कभी घर पर तो ऐसा माहौल नहीं देखा ना कभी पापा को इस तरह से मम्मी से बात करते देखा है। इस बात का हम सबको एहसास की मा की क्या एहमियत है हमारी ज़िन्दगी में,हमारे घर को घर बनाने में।
आदमी कितनी आसानी से औरत के काम को फिजूल और आसान बेटा देते हैं।
सुबह सुबह उठ कर सबकी लिए नास्था तैयार करना,फिर घर की साफ सफाई,बच्चों को नहलाना,दूफैर का खाना बनाना,बच्चों को सुलाना,कपड़े धोना,फिर शाम का नाश्ता और चाई बनाना,बाहर का काम पड़ जाए तो वो भी देखना,बच्चों को पढ़ना लिखना, होम वर्क करवाना,रात का खाना बनाना वो भी सबकी पसंद और फरमाइश के हिसाब से अलग अलग,फिर सबसे आखिर में सोना।
क्या ये सारे काम कम हैं कहीं से,सबकी एकछाओं का ध्यान रखने के बाद भी जब ये सवाल उठता है के तुम करती क्या हो तो ठेस पहुंचती है । सिर्फ पैसे कमाने का मतलब काम करना तो नहीं होता ना। और मैं तो अपनी जॉब,अपना कैरियर,सब छोड़ के घर की ज़िम्मेदारियां संभाल रही हूं फिर भी आज ऐसा सब सुनने को मिल रहा है मुझे।
वक़्त तो ज़रूर बदला है,हम मॉडर्न भी हुए हैं पर अफसोस इस बात का है के आज भी लोगों की सोच उतनी विकसित नहीं हो पाई। लोग वेस्टर्न कल्चर तो अपनाना चाहते हैं पर उनकी मानसिकता अभी भी वही है पुरुष प्रधान देश वाली। जहां औरत कभी आदमी को जवाब नहीं दे सकती,ना आदमी से ज़्यादा कमा सकती है,ना घर की बागडोर संभाल सकती है।
दुख इस बात का है के मुझ जैसी इतनी पढ़ी लिखी, रेबेलियस लड़की भी इन रूढ़िवादी परंपाओं और सोच के आगे झुक गई।
- अमिता शर्मा
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