इक्कीसवीं सदी,कहने और सुनने में कितना अच्छा लगता है ना।ऐसा प्रतीत होता है मानो कितने ज्यादा एडवांस हो गए हैं,लेकिन क्या ये वाकई में सच है??
सदियों से हमारा देश पुरुष प्रधान रहा है,औरत चाहे कितना ही काम करे,भले ही खुद को मिटा दे अपनो के लिए फिर भी दोष उसमें ही ढूंढा जाता है।
एक सहेली है मेरी निशा,अभी कुछ ४ साल पहले शादी हुई है उसकी, लव मैरिज होने के बावजूद बहुत कुछ झेला उसने फिर भी चुपचाप रही कभी किसी को अपने कष्ट बयान नहीं किए।
वो लड़की जिसे खाने का ख भी न आता है, उस ने १ महीने में ही यूट्यूब पर और अपनी मां से रेसिपी पूछ पूछ कर खाना बनाना सीखलिया। रोज़ सुबह से शाम तक कोल्हू के बैल के समान लगी रहती फिर भी कोई झूठे को भी उसकी प्रशंसा न करता।
उल्टा महोल्ले भर में सबको ये पता था के बहु रानी कोई काम नहीं करती,सास दिनभर काम में लगी रहती हैं, जबकी असल में तो सब उल्टा था।
निशा की सास उसके सामने कुछ कहती तो अपने बेटे के सामने कुछ,इस तरह वो अपने बेटे और बहू के बीच गलत फहमी का बीज बोने में कामयाब हुईं।
निशा सब देख समझ रही थी और हैरान थी के एक औरत दूसरी औरत के साथ ऐसा कैसे कर सकती है।
लाचार होने के बावजूद वो कभी शुभम को सच्चाई बयान न कर पाई,और अकेले में रोती रहती।
मां बाप से शर्म के मारे ना कह पाई कुछ क्योंकि अपनी पसंद के लड़के से शादी की थी अपनी मुंह से ही उसकी मां की तारीफों का बखान किया था।
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तो क्या लगता है आपको निशा सबकुछ चुपचाप सहती रहेगी या फिर शुभम को जाकर सब सच सच बता देगी??
क्या शुभम अपनी बीवी जो इतने सालों से उसका प्यार है उसपर यकीन करेगा या अपनी मां का जिसने उसे जन्म दिया??
जानने के लिए पढ़िए इस कहानी का दूसरा भाग .
अमिता शर्मा
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