जिंदगी का चक्र

 बस यूंही अकेले बैठकर थोड़ा सा आराम करना चाहती थी या यूं कहिए के खुद को वक्त देना चाहती थी।

सर,दर्द की वजह से फटा जा रहा है,सुबह से ही ये हाल है।

समझ नही आता कभी कभी के क्या करूं और कैसे करूं के मेरे शौहर को खुश कर सकूं।
कभी कभी तो एकदम नर्म मिजाज़ रहते हैं और कभी एकदम गर्म,सख्त मिज़ाज के।
किसी बात से परेशान भी होंगे तो सारा गुस्सा मुझपर ही निकलते हैं।
मैं कहां जाऊं,किस्से कहूं।

मेरे शौहर का कहना है में कमाता हूं,दिन भर बाहर रहकर तुम लोगों के लिए कमाता हूं।
और तुम तो घर पर रहती हो बस,सोती हो,आराम करती,घर पर इसके सिवा और काम ही क्या है तुम्हे।

समझ नही आता के आज के प्रोग्रेसिव ज़माने में इतने प्रोग्रेसिव शौहर से निकाह कर के क्या हासिल कर लिया मैने।
खुद के लिए प्रोग्रेसिव हैं,बाहर लोगों के लिए प्रोग्रेसिव हैं,खुद के साथ काम कर रही लड़कियों के लिए प्रोग्रेसिव हैं लेकिन अपनी बेगम के लिए वही पुरानी सोच रखते हैं।



ये जिंदगी का चक्रव्यू भी कैसा है आज मैंने जिस आदमी को खुदके के लिए बेहतर समझा,जिसे मिलकर मुझे लगा के वो मुझे समझेगा और मेरा हमसफर ही नही मेरा दोस्त बनकर रहेगा,आज वो कुछ अलग अलग सा मालूम दे रहा है।

कुछ वक्त बाद मेरी बेटी भी किसी ऐसे शक्स को ढूंढेगी जो उसकी नज़र में उसका खुदसे ज्यादा ध्यान रखेगा पर असल में तो वो हर चीज का बदला लेगा मेरी बेटी से।
उस हर चीज़ का जो वो करेगा उसके लिए।

यहां हर चीज़ की कीमत है,आपके प्यार की भी।
संभल कर सोचिए और चुनिए।

चाहे लोग कितना आगे बढ़ जाएं लेकिन एक औरत को हर चीज़ का हिसाब आज भी देना पड़ता है,अपने हर फैसले के लिए जवाब देना पड़ता है।

ये देश ये दुनिया औरत की पूजा करती हैं पर असल जिंदगी सिर्फ उन्हें धूतकर्ती हैं।

अमिता शर्मा

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