गमगीन आंखों और विचलित मन के साथ मैं सोच में डूबी सोच रही थी के कितना अच्छा था वो बचपन जब बेफिक्र होकर मैं घर में घूमती थीं,
ना अच्छा दिखने की फिक्र थी,
ना लोगों की सोच का डर,
ना जिम्मेदारी थी,
@१बस हाथ में खुशियों की पिचकारी थी।
पता नही किसने वो पिचकारी चुरा ली,
और मेरे हाथों में जिम्मेदारी थमा दी,
कहां वो वक्त था जब ज़रा सी खरोच पर भी पट्टी लगा कर सबको दिखाती थी,
और अब गहरे जख्मों को दिल में दबा लेती हूं,
डर लगता है कोई देख न ले,कोई समझ ना ले,
बेफिजूल मज़ाक उड़ेगा,
मेरे दर्द का सरेआम फिर से तमाशा बनेगा।
कुछ हो ना हो इस इस वायस्कता(एडल्टहुड) ने इतना समझा दिया है,
बचपन के वो गलियारों में बस खोकर खुश होसक्ति हूं,
कोई मुझे समझेगा ऐसा ख्वाब बन सकती हूं,
फरेब की चादर ओढ़ी है सबने,
ऐसे में कोई अपना मुझे कैसे मिलेगा।
अमिता शर्मा
Comments
Post a Comment